किताब के बारे में
एक तरफ सुदीप है जिसने क्लास 12th के बाद पढ़ाई और घर दोनों छोड़ दिया था और मिलियनेयर बन गया। वहीं दूसरी तरफ चित्रा है, जो अपनी लिखी किताबों की पॉपुलैरिटी की बदौलत आजकल हर लिटरेचर फेस्टिवल की शान है। बड़े-से-बड़े कॉलेज और बड़ी-से-बड़ी पार्टी में उसके आने से ही रौनक होती है। हर रविवार उसका लेख अखबार में छपता है। उसके आर्टिकल पर सोशल मीडिया में तब तक बहस होती रहती है जब तक कि उसका अगला आर्टिकल नहीं छप जाता।
हमारी दो जिंदगियाँ होती हैं। एक जो हम हर दिन जीते हैं। दूसरी जो हम हर दिन जीना चाहते हैं, अक्टूबर जंक्शन उस दूसरी ज़िंदगी की कहानी है। ‘अक्टूबर जंक्शन’ चित्रा और सुदीप की उसी दूसरी ज़िंदगी की कहानी है।
किताब "अक्टूबर जंक्शन" से
"हमारे पास कहानी के दो वर्जन होते है। एक दुसरे को सुनाने के लिए और दूसरा, अपने आपको समझाने के लिए। जिस दिन कहानी के दोनों वर्जन एक हो जाते है उस दिन लेखक अपनी किताब के पहले पन्ने पर लिख देता है, इस कहनी के सभी पत्र काल्पनिक है। इनका किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई लेना-देना नहीं है। यह एक अदना-सा झूट पूरी कहानी को सच्चा बना देता है।"
"सारी दुनिया दिन-रात इस इंतजाम में है की लोगो को कम से कम अपने अंदर झाँकने की फुर्सत मिले। इस दौर मे किताब पढना अपने आप मे बड़ा काम है। किताब का काम वही है जो पानी का एक छोटे से पौधे के लिए होता है। खुशबु और खूबसूरती पानी मे नहीं होती लेकिन हर पौधे को पानी मे अपनी खुसबू ढूंढनी पड़ती है।"